भूल गया साग और मक्की की रोटी का जायका

नेरचौक (मंडी)। बल्हघाटी में सरसों के साग का जायका बीते जमाने की बात हो गया है। सर्दी के मौसम में हर खेत में सरसों की फसल लहलहाती थी। गंदम की फसल के साथ सरसाें का साग हर खेत में उगाया जाता था, अब खेतों में सरसों की पैदावार देखने को नहीं मिल रही है। क्षेत्र की 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला सत्या ठाकुर, 80 वर्षीय बर्फी देवी, 76 वर्षीय स्वामी राम, बालक राम, मीरा बानो का कहना है कि पूर्व में बल्ह क्षेत्र में सरसों की पैदावार खेतों में लहराती थी। साग के अलावा सरसों से तेल निकालने के बाद खल को मवेशियों के लिए चारे के रूप में प्रयोग करते थे।
सर्दियों के दिनों में सरसों साग-मक्की और उसमें मक्खन को बड़े ही चाव से खाया जाता है। आधुनिकता की चकाचौंध और पाश्चात्य एवं चाइनीज व्यंजनों के कारण यह व्यंजन अब पुराना हो गया है। युवा पीढ़ी मक्की की रोटी और साग को छोड़कर बर्गर, मैगी, पीजा, चौमिन को प्राथमिकता दे रहे हैं।
सेवानिवृत्त बीएमओ बलदेव ठाकुर का कहना है कि मेहनतकश लोगों के लिए सर्दी के मौसम में सरसों का साग और मक्की की रोटी खाना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। पीजा, बर्गर से बच्चों की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। सरसों स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद है। नेरचौक में आटा चक्की चला रहे पवन शर्मा का कहना है कि किसान मक्की की खेती मात्र कमाई के लिए कर रहा है। उनकी मशीन पर अब मक्की पिसाई के लिए बहुत कम लोग आते हैं। मक्की की रोटी और सरसों का साग अब गुजरे जमाने की बात होता जा रहा है।

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